देव

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

देव

महानुभावों! जब मैं एक छोटा बच्चा था तो पड़ोसी के लड़के के साथ शिव मन्दिर जाया करता था। वहाँ प्रतिदिन शाम को टिमटिमाते बल्बों की रोशनी में, तेज़ आवाज़ में बजते हुए लाउडस्पीकर पर शेरांवाली की आरती की जाती थी और हनुमान चालीसा बोला जाता था जो बरबस ही मन को आर्किषत करता था और मैं वहाँ जाने से स्वयं को रोक नहीं पाता था। थोड़ा बड़ा हुआ तो चाचा जी मुझे अपने साथ जैन मंदिर ले जाने लगे। वहाँ दसलक्षण पर्व में शाम को भजन-कीर्तन होते थे। धीरे-धीरे बड़ा होता गया और मन में यह प्रश्न उठने लगा कि शिव-मन्दिर में मानवाकृति न होने पर भी जिस शिवलिंग के पत्थर की पूजा की जाती है, वह भगवान है या शेर की सवारी करने वाली शेरांवाली माता भगवान है या जैन मंदिर में विराजमान वीतरागी, मनोज्ञ प्रतिमा ही भगवान का वास्तविक स्वरूप है जिस के दर्शन मात्र से ही असीम शांति का अहसास होता है। प्रश्न का समाधान यह मिला कि शेरांवाली माता, शिव, राम आदि सभी देवी-देवता हैं, भगवान नहीं। अपनी इच्छा-पूर्ति के लिए लोग पीपल की या कुल देवताओं की पूजा करते हैं या व्रत-उपवास करते हैं। संकट के समय मैं भी व्रत करता था, मन्नत माँगता था और मन में इच्छा-पूर्ति की आशा लेकर देवी के दरबार में भी चला जाता था लेकिन इसी बीच एक्सीडेंट हो जाने के कारण 4 महीने तक बिस्तर से हिल भी नहीं पाया। तब मेरा मन यह सोचने पर मज़बूर हो गया कि अगर मेरी इच्छा पूरी नहीं करनी थी तो न सही, पर पास न बुलाने का यह तरीका तो ठीक नहीं था।

इस प्रकार जीवन के कई अच्छे-बुरे अनुभवों के आधार पर मैं इतना ही कहूँगा कि जो देव अस्त्र-शस्त्र धारी, हिंसादि उपकरणों से युक्त हों वे सच्चे देव नहीं हो सकते। सच्चे देव तो वही हो सकते हैं जो सर्वज्ञ, वीतरागी और हितोपदेशी होते हैं, राग-द्वेष आदि 18 दोषों से रहित होते हैं। जो समस्त पदार्थों को एक साथ जानने वाले होते हैं, जो जीवों को हित का उपदेश देते हैं, वही सच्चे देव, अरिहन्त देव कहलाते हैं। 

इनके अलावा पूजे जाने वाले देव कुदेव कहलाते हैं। ध्यान रखो, जो मोक्ष मार्ग पर चलने वाले हैं उन्हें हमेशा सच्चे देवों की ही आराधना करनी चाहिए ताकि उनकी वीतरागता, उनका अनंत ज्ञान, उनका चारित्र हमारे अंदर भी आए और जो कुदेवों को पूजता है, वह संसार-परिभ्रमण में ही फंसा रहता है, क्योंकि कुदेवों को पूजने से सांसारिक सुख-सुविधाएं तो मिल सकती हैं पर सच्चा मोक्ष-सुख सच्चे देवों की भक्ति से ही मिल सकता है।

अब हमें स्वयं निर्णय करना है कि हमें संसार का सुख चाहिए या आत्मा का सुख।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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