चिंता चिता के समान है - इससे बचें

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

चिंता चिता के समान है - इससे बचें

मन के अनेक रूप हैं। कभी यह एवरेस्ट की चोटी पर चढ़कर ठंडी बर्फीली हवाओं का आनन्द लेने लगता है, तो कभी बंगाल की खाड़ी में समुद्री तूफानों का सामना करने लगता है। कभी आलीशान महलों की कल्पना में विचरण करता रहता है तो कभी बड़ी-बड़ी गाड़ियों में घूमने का विचार करता रहता है।

तात्पर्य यह है कि मनुष्य हर समय मन से अपने आप को किसी न किसी विचार में उलझाए रखता है और सुखी कम, दुःखी अधिक होता रहता है। कालान्तर में यही सोच चिंता में परिवर्तित हो जाती है।

मनुष्य अधिक धन-दौलत से बड़ा नहीं बनता, वह बड़ा बनता है अपने विचारों से। झोंपड़ी में रहने वाला भी अपने ऊँचे विचारों और विशाल हृदय वाला होने से अमीर हो सकता है और महलों में रहने वाला अपने निम्न विचारों के कारण ग़रीब की श्रेणी में आ सकता है। जिसकी सोच बड़ी होती है, उसका भाग्य भी बड़ा होता है। स्वयं को सौभाग्यशाली बनाने के लिए बस, मन को विशाल व विस्तृत सोच वाला बनाना होगा। अपने दिल को दायरा दिल नही, दरिया दिल बनाओ ताकि सारा विश्व उसमें समाहित हो सके।

गुरु अपने तन की परवाह छोड़ कर संसार-हित में लीन रहते हैं और संसार अपने मन की परवाह करने में ही लगा रहता है। तुम गुरु के तन से आकृष्ट होकर उनकी सेवा करते हो और गुरु तुम्हारे मन को उज्ज्वल और पवित्र बनाना चाहते हैं। मन पवित्र बने तो मनुष्य देवता बन जाता है और मन दूषित विचारों को ग्रहण करता रहे तो वही मनुष्य दानव बन जाता है। हमारे जीवन की नाव मन के भावों से ही हिचकोले लेती रहती है और आगे बढ़ती रहती है।

मन के भावों को ऊँचा उठाने में सत्संग का महत्त्वपूर्ण योगदान है। सत्-संग अर्थात् गुरुओं का संग भी किसी भाग्यशाली व्यक्तियों को ही मिलता है। मन की दुर्भावनाएं मनुष्य को सत्संग में आने ही नहीं देती। तन का पेट भरना आसान है। उसे दिन में दो बार रोटी खिला दो तो सारा दिन चुपचाप बैठा रह सकता है, पर मन का घड़ा तो कभी भरने में ही नहीं आता।

मन का पेट इंडिया गेट के समान हर समय खुला ही रहता है। जैसे इंडिया गेट के नीचे से प्रतिदिन, प्रतिसमय हज़ारों लोग आते और जाते रहते हैं, वैसे ही मन में प्रतिदिन, प्रतिसमय हज़ारों विचार आते और जाते रहते हैं।

पहला पेट यमराज का जो कभी नहीं भरता और दूसरा पेट मनुष्य के तन और मन का जो कभी खाली नहीं रहना चाहता। इसे भरने के चक्कर में कितना नादान हो गया है आदमी! हथेलियों की रेखाओं में अपना मुकद्दर तलाश करता फिर रहा है। प्यास लगे तो वह एक लोटा पानी से भी बुझ जाती है, लेकिन उसके लिए समन्दर भर पानी की तलाश में भटकता रहता है। पेट तो सभी जीव किसी न किसी तरह भर ही लेते हैं, पर आदमी तो पेटी भरने की फिराक में रहता है। अपने भूखे मन और भूखी निगाहों को सन्तुष्ट करने के लिए ही तो यह भाग-दौड़ कर रहा है।

हम जैसे संत और सामान्य आदमी में यही अन्तर है। हम भी जीव हैं। इसी देश की धरती पर रहते हैं। अन्तर केवल भावों में है। संसारी व्यक्ति संसार के बारे में सोचता है और संत संथारा के भाव करते हैं। शैतान आतंकवादी विचारों का पोषण करता है और संत अरिहंत बनने की ओर अपने कदम बढ़ाते हैं। 

मैं आचरण बदलने से पहले मन के भावों को बदलने की बात करता हूँ। सोचने का ढंग बदल लो तो सारी दुनिया ही बदल जाएगी। सबके हित की बात सोचने वाले का घर स्वर्ग बन जाता है और केवल अपने हित की बात सोचने वाले का घर नरक में परिवर्तित हो जाता है। मैं केवल वैचारिक क्रांति लाने का संदेश देना चाहता हूँ।

दिगम्बर संत होने के लिए केवल तन के वस्त्रों का त्याग ही पर्याप्त नहीं है, उसके लिए मन पर पड़े दुर्भावनाओं के आवरण को भी उतार कर फेंकना पड़ता है। कुंओं को बदलने से अपनी बाल्टी नहीं भर सकती। उसे भरने के लिए बाल्टी की तली में ठोस पैंदे की आवश्यकता है। यदि आप अपने मन की टूटी हुई बाल्टी में संतोष का पैंदा लगा लो तो मन के विचारों की बाल्टी को भरा जा सकता है।

आदमी उच्च शिक्षा प्राप्त करके खूब पैसा कमा लेता है, लेकिन सन्तुष्टि फिर भी नहीं होती। जन्म से मरण तक अपनी बिन पैंदे की मन की टूटी हुई बाल्टी लिए घूमता रहता है, लेकिन उसे वह हर समय खाली ही दिखाई देती है।

आदमी जन्म के समय तो फिर भी अपने साथ अपना भाग्य लेकर आता है, पर मरण के समय हाथ भी खाली और पुण्य की बाल्टी भी खाली; क्या लेकर जाएगा अगले जन्म में अपने साथ? दुनिया में आते समय अपना शरीर तो लेकर आए थे, पर मरण के समय तो उसे भी यहीं छोड़ कर जाना है।

जब तक आदमी के मन में संतोष नहीं होगा, तब तक वह दुःखी ही बना रहेगा। वह अपने दुःख से कम और ओरों के सुख को देखकर अधिक दुःख मानता है।

जो मिला है, उसी में संतोष मानना चाहिए। फिर संसार के सभी धन धूलि के समान व्यर्थ लगने लगेंगे।

राम अपनी कुटिया में भी सुख मान रहे हैं और रावण सोने की लंका में बैठा हुआ भी चैन की नींद नहीं सो पा रहा है। सुखी होना है तो अपनी सोच को सकारात्मक बनाओ। नकारात्मकता ही दुःख का सबसे बड़ा कारण है।

गुरुदेव कहते हैं कि हमारा मन सदैव पाप की ओर इसी प्रकार जल्दी आकृष्ट होता है, जैसे मुंह में एक दांत टूट जाए तो जीभ बार-बार उसी तरफ जाती है। मुनि श्री ने कुविचारों को मन में पनपने से पहले ही कुचल देने की सलाह देते हुए कहा है कि कुविचारों को पैदा होने में देर नहीं लगती। इसलिए उन्हें पैदा होने से पहले ही नष्ट कर देना अनिवार्य है। एक कुविचार या एक शंका का कीड़ा सारे जीवन को बर्बाद कर सकता है।

चिंता सारे जीवन को भस्म कर देती है। चिंता की अग्नि, चिता की अग्नि से भी अधिक खतरनाक है। यह हमें तिल-तिल करके मुत्यु के मुख की ओर ले जाती है और जीते जी मार देती है। सुविचार लाने के लिए हमें धर्म की शरण लेनी होगी। जैसे अच्छी शिक्षा ग्रहण करने के लिए विद्यालय में प्रवेश लेना होता है और बुरे विचार बिना सिखाए ही आ जाते हैं। उनके लिए किसी विद्यालय की आवश्यकता नहीं होती।

जब तुम अपनी दुकान, ऑफिस या फैक्टरी से घर आते हो तो अपने पहने हुए वस्त्र आकर खूंटी पर टांग देते हो और घर के वस्त्र पहन लेते हो, उसी प्रकार अपनी बाहर की चिंताओं को भी बाहर की खूंटी पर टांग देना और घर में प्रसन्न चित्त होकर प्रवेश करना। देखना तुम्हें कितना सुकून मिलता है और जीवन चिंताओं से मुक्त हो जाता है।

याद रखना जिसके जीवन में चिंता का प्रवेश हो जाता है, उसका जीवन चिता की अग्नि में जलने से पहले ही मृतप्राय हो कर बर्बाद हो जाता है। अतः चिंता नहीं, भगवान का चिंतन करो।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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