छत्रपति शिवाजी का साहस

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

छत्रपति शिवाजी का साहस

समर्थ रामदास के प्रति शिवाजी के मन में बहुत श्रद्धा थी। वे नरेश होकर भी अपने गुरु रामदास जी की सदा भक्ति किया करते थे। एक दिन की बात है, स्वामी जी शिष्यों के साथ वन में जाते हुए सहसा एक स्थान पर ठहर गए और ज़मीन पर लेट कर बोले कि मेरे पेट में असहनीय दर्द हो रहा है। क्या कोई मुझे शेरनी का दूध पिला कर इस पीड़ा से छुटकारा दिला सकता है?

सभी शिष्य चुप हो गए। लेकिन वीर शिवाजी शेरनी का दूध लाने के लिए जंगल की ओर जाने के लिए तैयार हो गए। वे जानते थे कि शेरनी का दूध स्वर्ण पात्र में ही ठहर सकता है। इसलिए उन्होंने अपने महल से एक सोने का कटोरा मंगवाया और उसे लेकर सीधे पर्वत की ओर बढ़ चले जहाँ एक घना जंगल था। कुछ दूर जाने पर उन्हें एक शेरनी दिखाई दी जो अपने बच्चों के साथ वन में घूम रही थी। जैसे ही शिवाजी ने उसे देखा तो उसे भी उनकी आहट मिली और अपनी चमकती हुई आँखों को उनकी ओर घुमाया। 

साहस के अवतार शिवाजी शेरनी से बोले - हे माता! मुझे तुम्हारे दूध की आवश्यकता है क्योंकि मेरे पूज्य गुरुजी के पेट में असहनीय दर्द हो रहा है। उनका कहना है कि शेरनी का दूध पीने से ही उनकी पीड़ा शांत हो सकती है। दया करके मुझे अपना थोड़ा सा दूध दुह लेने दो। 

शेरनी ने फिर से शिवाजी की ओर देखा। उनकी आँखों में याचना का भाव था। शेरनी तुरंत शांत होकर खड़ी हो गई। शिवाजी ने शांत भाव से दूध दुहा और शेरनी के दूध से भरे हुए कटोरे को लेकर अपने गुरु जी के पास पहुँचे। 

स्वामी रामदास ने उनके साहस की भूरी-भूरी प्रशंसा की और उन्हें महान आदमी बनने का आशीर्वाद दिया।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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