Career के चक्कर में Character न खोएं

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

Career के चक्कर में Character न खोएं

वर्तमान पीढ़ी को मिल रही लौकिक शिक्षा जीवन का निर्वाह कर सकती है, निर्माण नहीं। यह बच्चों को भौतिक विज्ञान में पारंगत बना सकती है, पर संस्कार नहीं दे सकती। आज के विद्यार्थी का संस्कारवान, नेकदिल, सेवाभावी बन कर समाज व राष्ट्र के लिए उपयोगी बनने का लक्ष्य स्वप्न बन कर रह गया है। सब भौतिक सुख-साधनों में उलझ कर रह गए हैं। विद्यार्थी Career बनाने के चक्कर में Character को खोते जा रहे हैं।

विद्यार्थी के आचरण को शुद्ध और स्वच्छ बनाने में विद्यालय का वातावरण और वहाँ से प्राप्त की गई शिक्षा का महत्त्वपूर्ण योगदान है। विद्यालय अपने इस कर्त्तव्य को निभाने में पूर्णतया अक्षम प्रतीत हो रहे हैं। स्कूल-कॉलेजों का गंदा वातावरण और निरंकुश मर्यादाहीन माहौल विद्यार्थी को भौतिक आकांक्षाओं और प्रतिस्पर्द्धा के जंगल में दिशाहीन बना कर भटका देता है। चरित्रहीन कैरियर-प्रधान शिक्षा का वातावरण देखकर मेरे मन में विचार आता है कि मैं ऐसे वातावरण को शैक्षणिक संस्थाओं में पनपने ही नहीं दूँगा। जो विद्यालय शिक्षा का मंदिर होते थे, उनके पवित्र वातावरण को यदि समय रहते बचाया नहीं गया तो भविष्य में इसके घोर भयावह परिणाम भुगतने पड़ेंगे।

ऐसे वातावरण को बदलने के लिए जो भी संघर्ष करना पड़े, मैं कभी पीछे नहीं हटूंगा। मार्ग में चाहे कितने भी अवरोध आएं, पर मैं उनके सामने हार नहीं मानूँगा। यदि आज हम हार गए तो हमारे बच्चे कभी सिर उठाकर जीने लायक भी नहीं रहेंगे। सभी बच्चों को जीवन निर्वाह के लिए अच्छी शिक्षा, सम्मानित जीवन जीने के लिए अच्छा वातावरण, चरित्रवान बनने के लिए सुसंस्कार देना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है। मैं अपने देश को सम्पूर्ण मानव-जाति से प्रेम करने वाले देशभक्त युवक-युवतियां देना चाहता हूँ, जो चरित्रहीन बनाने वाली विषाक्त Carbon-dioxide को सब के चित्त से हटा कर स्वास्थ्यवर्धक नैतिक गुणों से युक्त Oxygen को देश के कोने-कोने में फैला दें।

इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ‘माँ जिनवाणी Public School का शुभारम्भ पुष्पगिरी में किया गया है, जहाँ L.K.G. से लेकर 12वीं कक्षा तक की शिक्षा दी जाएगी जो CBSE से Affiliated है और ‘माँ जिनवाणी College में BBA, BCA, B.Com, B.Sc, B.A. एवं Degree College का शुभारम्भ किया गया है। 

गुरुदेव ने कहा कि मर्यादा को अपने हृदय में आत्म-सात करने वाला, सभ्यता और संस्कारों के विवेक से अपने हृदय को प्रकाशित करने वाला ही सम्यग्ज्ञान के दीपक से अपनी राह प्रशस्त कर सकता है। सभ्यता और संस्कारों की जड़ ही वर्तमान पीढ़ी की नाज़ुक पौध का सहारा बनेगी, जिसके आश्रय से आज के युवक-युवतियां आने वाले समय में सकल विश्व के लिए महावीर की परम अहिंसा, बुद्ध की करुणा, जीसस का प्रेम, राम की मर्यादा और मोहम्मद के ईमान के आदर्श स्थापित करेंगे।

प्राचीनकाल में भारत में नालन्दा और तक्षशिला जैसी Universities होती थी, जहाँ विदेशों से लोग शिक्षा ग्रहण करने के लिए आते थे। आज हम देखते हैं कि भारत की आज़ादी के बाद दिनोंदिन शैक्षणिक व चारित्रिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है। इस देश के शासकों व अर्थलोलुप शिक्षाविदों ने भारतीयों के समक्ष पाश्चात्य देशों की शिक्षा-नीति की झूठन परोस दी है, जो विकृत शिक्षा देकर स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं कि हमारा बच्चा तो कॉनवेंट स्कूल में पढ़ता है। यह भारतीयता की सुसंस्कृति के चन्द्रमा पर काले धब्बे के समान है।

यह धब्बा सभी शिक्षा शास्त्रियों के लिए गहन चिन्तन का विषय है। आज बच्चों से उनका बचपन कब छिन गया, इसका पता न तो बच्चों को चल पाता है और न उनके माता-पिता को। रोज़गार की तलाश में भटकते हुए युवकों के यौवन को कब कलंक लग जाए और वे दिशाविहीन होकर ग़लत रास्ते पर कब चल पड़ें, इसका भी भान नहीं है।

युवक-युवतियां कब मर्यादा की सीमा को लांघ जाएं और शर्मसार पिता को कब आधुनिक ख्यालों वाला होने का ढोंग करना पड़े, कब घर के बुज़ुर्गों की पगड़ियां सरे बाज़ार उछल जाएं और वे सबके हास्य का पात्र बन जाएं, कोई नहीं कह सकता। फिर सारा दोष उनके लालन-पालन पर मंढ दिया जाता है।

घर में कब आत्महत्या जैसे दुष्कर्म के लिए प्रेरित होकर गहरे कुएं बनाए जा रहे हैं, कोई सोच भी नहीं सकता। 

मर्यादाशील, विनयवान, पारिवारिक प्रेम व सौहार्द जैसी भावनाओं की शवयात्रा कब निकली, कब इन भावनाओं का अंतिम संस्कार कर दिया गया, कब इनकी चिता जलाकर इन्हें राख में मिला दिया गया है, किसी को पता नहीं चल सका। आज है कोई रिश्तेदार या पड़ोसी, जो किसी के दुःख से द्रवित होता हो और उसकी हर सम्भव सहायता करने के लिए तत्पर रहता हो? भावनाओं की मौत का कुआँ हर घर में खोदा जा चुका है।

ये मोबाइल और टी.वी. तो स्वयं किसी कुएं से कम नहीं हैं जो हमें सुविधा देने के नाम पर भावनात्मक और चारित्रिक सुरक्षा से बहुत दूर ले गए हैं। यदि स्कूल-कॉलेज जाने वाले युवक-युवतियों की शिक्षा व चरित्र में सुधार लाना चाहते हैं तो उनके मुख पर पड़े स्कार्फ रूपी नकाब पर तुरंत रोक लगा दो। सब का मुख खुली किताब की तरह होना चाहिए, जिस पर मन की कुटिल भावनाएं तुरन्त परिलक्षित हो सकें। बच्चों को संस्कार युक्त बनाने के लिए उनको पढ़ाने वाले शिक्षक अपनी चारित्रिक शुद्धता का विशेष ध्यान रखें, क्योंकि बच्चे आगे चलकर उनके ही पदचिह्नों पर चलने वाले हैं।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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