अनेकांत

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

अनेकांत

किसी गाँव में दो भाई रहते थे। दोनों की बुद्धि में दिन-रात का अन्तर था। एक भाई का दिमाग़ कम्प्यूटर से भी तेज़ चलता था और दूसरा उस मूढ़ कालिदास के समान था जो विवाह से पहले उसी डाल को काट रहे थे, जिस पर वे बैठे थे। यह कहानी सभी को मालूम है। बड़े भाई ने अपने छोटे भाई को आदेश दिया कि जाकर अपनी भाभी को उसके मायके से लिवा लाओ।

छोटे भाई को तो यह भी नहीं मालूम था कि वहाँ जाकर बात कैसे करनी है? बड़े भाई ने समझाया कि तुम्हें अधिक नहीं बोलना है। वे कुछ भी पूछें तो उसका जवाब केवल ‘हाँ’ और ‘न’ में देना है। एक बार कहना ‘हाँ’ और दूसरी बार कहना ‘न’।

वह अपने भाई की ससुराल मे पहुँचा। खूब खातिरदारी की गई। वह उनके स्वागत-सत्कार और आवभगत से अभिभूत हो गया। 

भोजनोपरान्त भाई के ससुर ने कुशल-क्षेम पूछी कि ‘गाँव में सब ठीक हैं न!’ 

छोटे कुंवर साहब तो ठानकर बैठे ही थे कि एक बार ‘हाँ’ कहना है और दूसरा बार ‘नहीं’ कहना है।

कुंवर साहब ने कहा - ‘हाँ।’

‘और तुम्हारे बड़े भाई साहब ठीक हैं।’

‘नहीं।’

ससुर ने चिन्तित होकर पूछा - ‘तो क्या तुम्हारे बड़े भाई साहब बीमार हैं।’

‘हाँ।’

‘कुछ औषधि वगैरह दे रहे हो या नहीं।’

‘नहीं।’

‘बहुत ज़्यादा बीमार हैं क्या?

‘हाँ।’

ससुर जी ने अपने माथे का पसीना पोंछते हुए कहा - ‘उनको कुछ होगा तो नहीं! बचने की उम्मीद है या नहीं!’

‘नहीं।’

‘अरे! इतने गम्भीर रूप से बीमार हैं?’

‘हाँ।’

‘कुंवर जी, हमारे दामाद अभी जीवित तो होंगे?’

‘नहीं।’

‘तो क्या उनकी मृत्यु हो गई?’

‘हाँ।’

इस वार्तालाप के बाद घर में कैसा कोहराम मचा होगा, इसकी कल्पना आप स्वयं ही कर सकते हो।

आज भी कुछ व्यक्ति अपना या दूसरे का भला-बुरा सोचे बिना अपने दुराग्रह पर अडिग रहते हैं कि हमें  अपनी बात के लिए ‘हाँ’ कहना है और दूसरे के लिए ‘न’ कहना है। भगवान महावीर के समय भी ऐसे दुराग्रही लोगों की कमी नहीं थी। सब अपनी निजि मान्यताओं को सही मान कर बैठे थे।

ऐसे समय में भगवान महावीर ने एक नई वैचारिक क्रांति का सूत्रपात किया। उन्होंने कहा कि केवल अपनी मान्यता को ‘हाँ’ नहीं कहना और दूसरे के विचारों को ‘न’ नहीं कहना; ऐसा न करने से समाज में ईर्ष्या-विद्वेष का कोहराम मच जायेगा।

भगवान महावीर ने विश्व समुदाय के समक्ष एक अत्यन्त मौलिक सिद्धान्त का प्रतिपादन किया और वह है - अनेकांत वाद। इसका अर्थ है कि मैं ‘ही’ सही नहीं हूँ, आप ‘भी’ सही हो सकते हैं। बस! वह कथन सत्य की कसौटी पर ख़रा उतरना चाहिए।

वास्तव में हमें दुराग्रही नहीं बनना कि मेरा ही धर्म ख़रा है अपितु यह सोचना है कि मैं उस धर्म का अनुयायी हूँ जो शुद्ध स्वर्ण के समान ख़रा है और मोक्ष-मार्ग पर चलाने वाला है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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