अनेकांत किसे कहते हैं ?
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
अनेकांत किसे कहते हैं ?
एक बार रामचन्द्र जी ने हनुमान से पूछा कि जब तुम जानकी की तलाश में अशोक वाटिका में पहुँचे तो वहाँ किस रंग के फूल खिले हुए थे?
हनुमान ने कहा कि भगवन्! वहाँ लाल रंग के फूल खिले हुए थे।
माता सीता बोली कि नहीं भगवन्! वहाँ सफेद रंग के फूल खिले हुए थे।
इस प्रकार की विरोधी समस्याओं का समाधान केवल अनेकांत की दृष्टि से ही सम्भव हो सकता है। रामचन्द्र जी ने दोनों की बात को सही माना और कहा कि हनुमान के नेत्र रावण के कुकृत्य के कारण क्रोध से लाल हो रहे थे, इसलिए उन्हें वहाँ लाल रंग के फूल खिले हुए दिखाई दे रहे थे और सीता की दृष्टि में अपने शील के प्रति दृढ़ विश्वास था, धवलता और शांति की आभा थी, इसलिए उन्हें वहाँ सफेद रंग के फूल खिले हुए दिखाई दे रहे थे।
‘कषाय पाहुड़’ में एक प्रश्न पूछा गया - कौए का रंग कैसा होता है?
आचार्य गुणधर स्वामी ने इस रहस्य का उद्घाटन करते हुए कहा - कौए का रंग लाल (रक्त की अपेक्षा से), पीला (पित्त की अपेक्षा से), नीला (नसों की अपेक्षा से), सफेद (हड्डियों की अपेक्षा से) और काला (चमड़ी की अपेक्षा से) है। अतः कौआ पंचरंगी है।
भगवान महावीर ने कहा - जहाँ एकांत (ही) की भाषा होगी, वहाँ टक्कर होगी; कलह, विवाद और संघर्ष होगा। युद्ध होगा, महायुद्ध होगा। जहाँ अनेकांत (भी) की भाषा होगी, वहाँ ठहराव होगा; सुलह, संवाद, प्रेम और आनन्द होगा। विचारों का आदान-प्रदान होगा, सत्य से साक्षात्कार होगा।
जैन दिगम्बर मुनिराज को रास्ते में विहार करते समय कितने ही लोग मिलते हैं जो महाराज को पागल, लुच्चा, नालायक आदि कहते रहते हैं, किंतु संत उन्हें भी अनेकांत की दृष्टि से ही देखते हैं। पागल वह जो मोक्ष को पाने के लिए संसार की सब सुख-सुविधाएं छोड़कर, यहाँ तक कि अपने तन के वस्त्र भी त्याग कर नंगे बदन, नंगे पाँव, गर्मी-सर्दी, भूख-प्यास को सहन करने के लिए सड़कों पर चल पड़ा है। लुच्चा वह जो अपने हाथों से अपने ही केशों का लोच करता है और नालायक वह जो दुनिया के किसी काम को अपने लायक नहीं समझता है, न अर्थोपार्जन करता है, न अपने लिए सुख-सुविधाएं जुटाता है।
एक बच्चे ने अपनी माँ से कहा कि मैं कल से स्कूल नहीं जाऊँगा। माँ ने पूछा कि क्यों? ऐसी क्या बात हो गई? बच्चे ने कहा कि वहाँ सब उलटा-पुलटा पढ़ाते हैं। कल तो टीचर कह रहे थे कि 4+5=9 होते हैं और आज कह रहे हैं कि 6+3=9 होते हैं। तब माँ ने उसे समझाया कि कई प्रकार से भिन्न-भिन्न संख्याओं को जोड़ने से योगफल 9 हो सकता है। केवल एक ही प्रकार की संख्या के योगफल पर दृढ़ न रहो।
मैं किसी का पिता हूँ तो किसी का पुत्र भी हूँ।
इसे ही अनेकांत कहते हैं।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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