अनेकांत और स्याद्वाद

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

अनेकांत और स्याद्वाद

वस्तु के अनेक विरोधी धर्मों को अनेक दृष्टियों से देखना और स्वीकार करना ‘अनेकांत’ है। इसे ही आइन्स्टीन ने सापेक्षता (Relativity) नाम दिया है।

किसी ने पूछा कि स्याद्वाद और अनेकांत में क्या अन्तर है?

ये दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। स्याद्वाद में तमाम संभावनाओं को तर्कपूर्वक स्वीकार किया गया है। जबकि अनेकांत में खुले मन की महिमा है। अनेकांत दर्शन है और स्याद्वाद उसकी अभिव्यक्ति (शैली) है।

सप्तभंगी किसे कहते हैं?

किसी कथन की शैली पर 7 प्रकार के प्रश्न उठते हैं।

1. स्याद् अस्ति - कथंचित है।

2. स्याद् नास्ति - कथंचित नहीं है।

3. स्याद् अस्ति नास्ति - कथंचित है भी और नहीं भी।

4. स्याद् अवक्तव्यम् - कथंचित अवर्णनीय है।

5. स्याद् अस्ति अवक्तव्यम् - कथंचित है लेकिन अवर्णनीय है।

6. स्याद् नास्ति अवक्तव्यम् - कथंचित नहीं है लेकिन अवर्णनीय है।

7. स्याद् अस्ति नास्ति अवक्तव्यम् - कथंचित अवर्णनीय है भी और नहीं भी। 

इसे एक उदाहरण से समझें। मान लो आपका स्वास्थ्य बिगड़ गया। आपने औषधि ली और स्वास्थ्य में सुधार हो गया।

किसी ने आपसे पूछा कि आपका स्वास्थ्य कैसा है?

आपका उत्तर होगा -

1. स्वास्थ्य अच्छा है।

2. स्वास्थ्य अच्छा नहीं है।

3. कल की अपेक्षा अच्छा है पर रोग से पूर्ण मुक्ति नहीं है।

4. कुछ कह नहीं सकते कि स्वास्थ्य अच्छा है या नहीं।

5. स्वास्थ्य तो अच्छा है पर कुछ कह नहीं सकते।

6. स्वास्थ्य तो अच्छा नहीं है पर कब ठीक होगा, कुछ कह नहीं सकते।

7. कल की अपेक्षा अच्छा है पर रोग से पूर्ण मुक्ति के बारे में कुछ कह नहीं सकते।

वस्तु के स्वरूप को समझने की यह एक व्यवस्था है, जो अनेकांत द्वारा ही सम्भव है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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