अहंकार
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
अहंकार
महानुभावों! अहंकार का दूसरा अर्थ है - मान, घमंड। जो व्यक्ति अहं की कार में सवार होकर अपना सफ़र तय करता है, वह कभी सफल नहीं हो पाता। उसे ज़िन्दगी में कभी मंज़िल हासिल नहीं हो सकती। इसलिए कहा गया है कि कभी घमण्ड के घोड़े पर सवार होकर हवा में नहीं उड़ना चाहिए वरना घमण्डी का सिर नीचा होते देर नहीं लगती।
आज हम जिस धन-बल, विद्या-बल या शारीरिक बल पर घमण्ड कर रहे हैं, क्या पता कल वह हमारे पास हो या न हो? सामान्य व्यक्ति मुख्यतया दो बातों पर अहंकार करता है - रूप पर या रुपया पर। हे नादान लोगों! रूप का क्या मान करते हो? जब सनत चक्रवर्ती तक का रूप स्थिर नहीं रह सका, जिसके रूप को देखने स्वर्ग से देवता भी आते थे तो हमारे-तुम्हारे रूप की तो क्या बिसात है? यह तन मिट्टी का है और मिट्टी में ही मिल जाएगा। जहाँ तक रुपए पर अहंकार करने का सवाल है, तो लोग प्रायः यह कहते हुए सुने जाते हैं कि मैं इतना धनवान हूँ, मेरे पास इतनी दौलत है कि मैं तुम्हें तो क्या, सारी दुनिया खरीद सकता हूँ तो उन्हें कौन समझाए कि यह धन-दौलत, यह लक्ष्मी तो इतनी चंचल है कि एक स्थान पर टिकती ही नहीं। आज तुम्हारे पास है और कल किसी ओर के पास होगी।
गुरुवर कहते हैं कि कभी अपनी उपलब्धियों पर घमण्ड मत करो कि मेरे पास क्या-क्या है। हमें यह कहने की आदत हो गई है कि मेरे पास यह है या वह है। उपलब्धियों पर घमण्ड करने के स्थान पर उनका उपभोग करो क्योंकि एक दिन तो उन्हें नष्ट होना ही है।
दूसरी बात गुरुवर यह कहते हैं कि न तो कभी अपने अतीत को भूलो और न अपनी औकात को। जो व्यक्ति इन दो बातों को याद रखता है उसमें कभी अहंकार नहीं आ सकता तथा जिस व्यक्ति में अहंकार आ जाता है वह गुणवान नहीं हो सकता। वह तो पत्थर की भांति कठोर बन जाता है। झाड़ के पेड़ की तरह तन जाता है जिस पर कभी फल नहीं लगते मगर जिसने अपने मान का गलन कर दिया है उसकी आत्मा में विनय का गुण स्वतः ही प्रकट हो जाता है। हम गुरुवर के चरणों में यह प्रार्थना करते हैं कि यह मान रूपी कषाय हमारी आत्मा से सदा के लिए विदा हो जाए और विनय व नम्रता का गुण हमारी आत्मा में प्रकट हो जाए।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
Bahut Sundar
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