आशा तृष्णा
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
आशा तृष्णा
आशा तृष्णा समाप्त करने पर ही सर्वोच्च सुख की अनुभूति होती है।
महानुभावों! ज्ञानी वही है जो संसार व शरीर के भोगों से विरक्त होकर अपनी आत्मा में रमण करता है। पहले समय में राजा-रंक दर्पण में सिर का एक सफेद बाल देखकर ही वैराग्य धारण कर लेते थे लेकिन आधुनिक समय में इस प्रकार वैराग्य धारण करने की कल्पना करना भी दुष्कर है।
मुनि श्री कहते हैं कि आशा-तृष्णा समाप्त करने पर ही सर्वोच्च सुख की अनुभूति हो सकती है। इंसान पर-वस्तु में सुख की खोज करता है। जबकि वास्तविक सुख तो उसकी अंतरात्मा में समाहित है। मुनि श्री ब्रह्मचर्य व्रत का महत्व स्पष्ट करते हुए संयमी जीवन की प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि धर्म बाज़ारों में नहीं बिकता। यह तो स्वयं कमाना पड़ता है और बिना त्याग के मुक्ति नहीं मिलती।
हमारा आचरण, खानपान तथा रहन-सहन धर्मानुकूल न होकर अशुद्ध हो गया है। जबकि मनुष्य-जन्म पाप-कर्मों का बन्ध करने के लिए नहीं, पुण्य कर्मों का संचय करने के लिए मिला है। अंत में महाराज श्री ने जीवन में अपनी क्षमतानुसार कुछ न कुछ त्याग करने का संकल्प दिलाया। आशा तृष्णा के त्याग से सबको सच्चे सुख की प्राप्ति हो।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
Comments
Post a Comment