श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
श्रद्धा के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं
एक रेलगाड़ी अपने गन्तव्य की ओर अपना लक्ष्य बना कर चलती जा रही है पर चलने के लिए उसे दो पटरियों की आवश्यकता है। यदि एक भी पटरी उसके पहियों के नीचे से निकल गई तो क्या होगा? जानते हो!
होगा क्या?
रेलगाड़ी पटरी से उतर जाएगी और......।
हम, जो उसमें सवार हैं, कभी अपने गन्तव्य पर नहीं पहुँच सकेंगे।
ठीक इसी प्रकार हम मोक्ष मार्ग पर जाने वाली रेलगाड़ी में सवार हैं, जो निश्चय-धर्म और व्यवहार-धर्म की दो पटरियों पर चल रही है। एक भी पटरी से हमारी रेलगाड़ी उतर गई तो क्या हम कभी अपने गन्तव्य पर पहुँच सकेंगे?
नहीं......।
घर में हमने तय किया कि हमें मंदिर जाकर महाराज जी के दर्शन करने हैं तो यह हुआ निश्चय और हम मार्ग पर चल पड़े तो यह है व्यवहार। निश्चय-नय के बिना व्यवहार का कोई लाभ नहीं और व्यवहार-नय के बिना निश्चय की प्राप्ति संभव नहीं।
इसीलिए अनेकान्त व स्याद्वाद का सिद्धांत बनाया गया है।
निश्चय की दृष्टि से शरीर व आत्मा दोनों अलग-अलग हैं। व्यवहार की दृष्टि से शरीर व आत्मा का संयोग होने पर ही धर्म ध्यान हो सकता है। आत्मा अकेला आया था और अकेला ही जाएगा। सांसारिक संबंध शरीर के हैं आत्मा के नहीं पर सांसारिक रिश्तों में भी सामंजस्य तो बिठाना ही पड़ता है।
विवाह के समय लड़का घोड़ी पर बैठता अवश्य है और उसका पिता पीछे-पीछे पैदल चलता है पर लड़के के मन में अपने पिता के अपमान का भाव नहीं होता। वह तो बहुमान ही रखता है। लेकिन उसका लक्ष्य केवल एक ही है - मुझे वधु को लेकर ही घर आना है। इसी प्रकार जब एक आदमी संन्यास लेकर घर से निकलता है तो उसका लक्ष्य केवल एक ही है - मुझे मुक्ति-वधु का वरण करना है। संसार के संबंधों में नहीं उलझना है फिर चाहे वे माता-पिता हों या भाई-बन्धु।
संसारी लोग मज़बूरी में मुस्कुराते हैं और संन्यासी मज़बूती में आनन्द मनाते हैं। यह पंच कल्याणक का सुनहरा अवसर केवल पाषाण को परमात्मा बनाने के लिए नहीं मिला। यह चेतन आत्मा को भी परमात्मा बनाने का बीजारोपण करने के लिए आया है।
भक्ति व्यवहार की क्रिया है जिससे पुण्य-बंध होता है और तप निश्चय की क्रिया है जिससे अंतरंग के परिणामों की शुद्धता होती है।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
Comments
Post a Comment