समीचीनता बनाएं

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

समीचीनता बनाएं

पाश्चात्य दर्शन के एक दार्शनिक ने भारत दर्शन करने के बाद अपनी डायरी में लिखा - भारत बहुत अमीर देश है लेकिन यहाँ के लोग बहुत ग़रीब हैं क्योंकि वे यहाँ की संपदा का उपयोग करना नहीं जानते। भारत के समान अध्यात्म संस्कृति से सम्पन्न देश दुनिया में और कोई नहीं है। लेकिन यहाँ के लोग अध्यात्म संस्कृति की ओर दृष्टि न करके पाश्चात्य संस्कृति की ओर दृष्टि करते हैं। इसलिए वे ग़रीब ही बने रहते हैं। 

यदि आप अध्यात्म संस्कृति की दृष्टि से अमीर बने रहना चाहते हैं तो ऐसी परिस्थिति में कभी भूलकर भी यह न कह देना कि मंदिर जाने की अपेक्षा वेश्यालय में जाना श्रेष्ठ है। मंदिर में जाकर भी यही देखना कि परिणाम कैसे हैं? यदि दो मित्रों के दो भाव, दो परिणाम भिन्न-भिन्न दिशा में चले भी जाएं तो भी उनमें एक दूसरे के प्रति आकर्षण होता है। 

यह मित्रता का मनोविज्ञान है। Psychological Effect ऐसे ही पड़ता है। दो मित्र विपरीत दिशा में सोचने पर भी एक दूसरे के प्रति आकृष्ट होते हैं। यह चुम्बकीय शक्ति होती है। उन दोनों मित्रों में से यदि एक अच्छे मार्ग पर चला गया और दूसरा बुरे मार्ग पर चला गया तो भी दोनों में एक दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहा। दोनों ने यही सोचा कि क्या पता, वह सही मार्ग पर चल रहा हो, शायद मैं ही गलत मार्ग पर आ गया हूँ। स्वयं गलत होते हुए भी अच्छी क्रियाओं को अच्छा कहना ही चाहिए। कभी-कभी यह अपने लिए या दुनिया के लिए घातक भी सिद्ध हो जाती है लेकिन स्वयं के लिए तो अच्छी क्रियाओं को अच्छा कहना लाभदायक ही है। 

मरना तो दोनों मित्रों को था पर मंदिर में जाने वाला मरकर नरक में गया और वेश्या के घर जाने वाला स्वर्ग में गया। शास्त्रों के अनुसार मुनि महाराज से पूछा गया कि दोनों में श्रेष्ठ कौन है? तो उन्होंने कहा कि मंदिर में जाकर मरना अधिक श्रेष्ठ है। उसे नरक ही तो मिला। भगवती आराधना में कहा गया है कि कोई सम्यग्दर्शन के साथ नरक में भी चला जाए तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है और यदि कोई सम्यग्दर्शन के बिना नौग्रैवेयक तक भी मुझे ले जाए तो मेरे लिए कोई कार्यकारी नहीं है।

इसलिए सदा अपने अंदर दूध तो ग्रहण करना है लेकिन शराब की दुकान पर नहीं। जब दूध ही पी रहे हो तो क्यों न किसी डेयरी फार्म पर जा कर पी लो। डेयरी फार्म में खड़े होकर यदि तुम शराब भी पी लोगे तो लोग यही कहेंगे कि तुम दूध ही पी रहे हो। चाहे तुम लाख कहो कि जो तुम डेयरी फार्म पर पी रहे थे वह दूध नहीं शराब थी तो भी लोग विश्वास नहीं करेंगे। 

तुम्हारी बुरी क्रिया का भी प्रभाव अच्छा ही होगा और यदि अच्छी क्रिया बुरे स्थान पर करोगे तो उसका दूसरे पर अच्छा प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए अपने जीवन में अच्छे या बुरे जैसे भी हम रहें, जाएंगे अच्छे स्थान पर ही। चाहे अच्छे काम का फल अच्छा मिले या न मिले, ऐसे स्थान पर जाने से गृहस्थ के कार्य में समीचीनता आ जाती है।

गुणीजनों का अभिनंदन केवल मुँह से ही न करें। हमारे यहाँ गुणीजनों का एवं तपस्वियों का अभिनंदन करने की परम्परा है। तप का अभिनंदन तप से करें और गुणीजनों का सच्चा अभिनंदन तो तभी होगा जब हम उनके गुणों को अपने जीवन में ग्रहण करें।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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