नेकी कर और कुएं में डाल

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

नेकी कर और कुएं में डाल

हिसार की खुली फिज़ाओं में गूंजा मुनि श्री विरंजन सागर जी का व क्षुल्लक श्री विसौम्य सागर जी का सिंहनाद, जब वे कटला रामलीला के खुले मैदान में हिसार वासियों के बीच में पहुँचे आत्मा की अलख जगाने।

क्षुल्लक श्री विसौम्य सागर जी ने कहा कि एक पवित्र हृदय में ही परमात्मा का निवास हो सकता है। जब तक हम अपने अन्दर के दुर्गुणों के मल को बाहर निकाल कर मन को शुद्ध नहीं बना लेते तब तक हम भगवान के गुणों को धारण नहीं कर सकते। सतत साधना के जल से ही मल का प्रक्षालन हो सकता है। 

यदि हमें ज्ञात हो जाए कि इस भूमि पर कोई मंदिर बनने वाला है तो क्या उस स्थान पर हम मल-प्रक्षेपण करेंगे?

बोलो न! नहीं करेंगे। 

उसी प्रकार यह तन भी भगवान का मंदिर है जिसमें विराजमान आत्मा में परमात्मा बनने की पूर्ण क्षमता है तो इसे राग-द्वेष, मोह-माया के मल से अपवित्र क्यों कर रहे हो? व्रत, संयम, त्याग, तपस्या, संतो का सान्निध्य ही तुम्हारी कलुषित आत्मा के मैल को हटा कर उसे मोक्ष-मार्ग पर लगा सकता है, जहाँ तुम्हें मिलेगा शाश्वत सुख, जन्म-मरण के दुःखों से मुक्ति।

मुनि श्री विरंजन सागर जी ने कहा कि अधिक नहीं, केवल दो बातें हैं जो हमें याद रखनी हैं और दो ही बातें हैं जो हमें भूल जानी हैं।

क्या हैं वे दो बातें?

किसी का उपकार करके भूल जाओ और दान देकर भूल जाओ।

एक व्यक्ति था, नाम तो आप जानते ही हो।

हाँ, भोंदुमल ही नाम था उसका। एक तालाब के किनारे से जा रहा था। तभी उसने देखा कि एक बच्चे का पैर फिसला और वह तालाब में गिर पड़ा। तैरना उसे आता नहीं था। डूबने लगा पानी में। 

भोंदुमल ने तुरंत तालाब में छलांग लगाई और उसे डूबने से बचा लिया। देखा तो पता चला कि यह तो अपने ही पड़ोस में रहता है।

बस! संक्षेप में इतना ही कि जहाँ भी वह बच्चा दिखाई देता, भोंदुमल उसे कहता कि उस दिन मैंने तुझे डूबने से न बचाया होता तो आज तू यह मौज नहीं मना रहा होता।

बच्चे का तो खाना-पीना, चलना-फिरना सब मुहाल हो गया। बच्चे ने तैरना सीखा और भोंदुमल से कहा कि चलो, उसी तालाब पर चलते हैं। वहाँ जाकर बच्चे ने तालाब में छलांग लगा दी और भोंदुमल से कहा कि आज मुझे बचाने की गलती मत करना वरना मैं तुम्हें सारी उम्र सुनाऊंगा कि मैं तो तैरना जानता था। यह आदमी झूठ बोल रहा है कि इसने मुझे बचाया।

तो महानुभावों! उपकार अपनी आत्मा की संतुष्टि के लिए किया जाता है न कि दूसरे पर अहसान करने के लिए।

इसी प्रकार दान देकर भूल जाओ वरना अहंकार की भावना से दिया गया दान शुभ फल देने वाला नहीं होता बल्कि अशुभ कर्म के बंध का कारण बन जाता है।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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