नीति शब्द का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
नीति शब्द का सदुपयोग करें, दुरुपयोग नहीं
आज के परिवेश में ‘नीति’ शब्द का सदुपयोग भी किया जा रहा है और दुरुपयोग भी। कोई इसे रणनीति से जोड़ता है, कोई चक्रनीति से, कोई वक्रनीति से, कोई राजनीति से और किसी ने इसे धर्मनीति से भी जोड़ा।
नीति का यही संदेश है कि यदि तुम मुझे अच्छे कार्य के साथ जोड़ कर चलोगे तो मैं तुम्हारे जीवन में अमन चैन का संचार कर दूँगी, तुम्हें फटेहाल से मालामाल कर दूँगी और तुमने मेरा नाम जोड़कर उस कार्य का दुरुपयोग किया तो वह काम भी बदनाम हो जाएगा।
कितना अच्छा शब्द है - राजनीति अर्थात् राज्य करने के लिए एक नीति का निर्धारण करो, कुछ नियम बनाओ और उसके अनुसार राज्य करो तो रामराज्य की स्थापना हो जाएगी। आज ‘नीति’ शब्द के दुरुपयोग ने ‘राजनीति’ को छल-प्रपंच का पर्यायवाची बना दिया है। राजनीति से झूठ और स्वार्थ की दुर्गन्ध आती है। राजनीति ने मनुष्यों के जीवन में से सरलता, सहजता और सहिष्णुता जैसे सुगन्धित गुणों को उखाड़कर बाहर फेंक दिया है और क्रूरता, कुटिलता और कुरीतियों के साथ-साथ विकृतियों के बीज बो दिए हैं।
इससे अधिक शर्म की बात क्या हो सकती है कि राज्य-संचालन के लिए बनाई गई नीतियाँ समाज व राष्ट्र के साथ-साथ धर्म में भी प्रविष्ट होकर उसे दूषित कर रही हैं। आज धार्मिक वातावरण में भी शकुनि की राजनीति के पासे फेंके जाते हैं, रावण की कुटिलता का व्यवहार होता है और मंथरा की मायाचारी का जाल फैला रहता है। जिस धर्म में चक्रनीतियाँ, वक्रनीतियाँ, रागनीतियाँ और राजनीतियाँ आचरण में लाई जा रही हैं; ऐसे मन्दिरों, मठों, मस्जिदों और गिरजाधरों को धर्म प्रभावना के नाम पर अधर्म फैलाने का कोई अधिकार नहीं है।
इनके स्थान पर ऐसे धर्मायतन बनाने चाहिए जो सही अर्थों में मानव को मानव बनाने की दिशा में कार्य करें। धर्मनीति में राजनीति के प्रवेश का कोई स्थान नहीं है अपितु राजनीति में धर्मनीति का समावेश होना चाहिए। धर्मनीति शक्कर के समान है और राजनीति पानी के समान है।
जब शक्कर में पानी सही अनुपात में मिलाया जाता है, तभी वह पेय स्वादिष्ट और शक्तिवर्धक बनता है। पानी में शक्कर की उचित मात्रा मिला कर उसे स्वादिष्ट शर्बत बनाया जा सकता है लेकिन यदि शक्कर में पानी की मात्रा अधिक हो जाए तो पानी उसकी मिठास को अपने साथ बहाकर ले जाएगा और वहाँ केवल दलदल ही दिखाई देगा।
हमें देश व धार्मिक स्थलों पर रावणराज्य नहीं बल्कि रामराज्य लाना है जहाँ वैर-विरोध के रक्त की नहीं; आपसी सद्भाव व प्रेम के दूध की नदियाँ बहती हुई दिखाई दें।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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