जीवन में संतुलन रहे
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
जीवन में संतुलन रहे
ज़िन्दगी उजाले से परिपूर्ण रहे इसके लिए अंधेरों का त्याग तो करना ही पड़ेगा। अंधेरे के अभाव से ही उजाले का अस्तित्व होता है। अंधेरे की विभिन्नता दर्शाने के लिए उजाले का वर्णन किया जाता है। यों तो अंधेरा और उजाला एक दूसरे पर निर्भर हैं पर यह भी तथ्य है कि कई स्थानों पर उजाले और अंधेरे, दोनों प्रकार के दुशाले ओढ़ने पड़ते हैं। अंधेरा उतनी ही सीमा तक स्वीकार्य हो जो विश्राम प्रदान करे और उजाला उतना ही कार्यरूप में रहे जो थकान लाने का कारण न बन सके।
इसी प्रकार काम के साथ विश्राम का भी उतना ही महत्त्व है। यदि एक ओर प्रातः काल का सूर्य स्फूर्ति देता है तो दूसरी ओर सांयकाल वही सूर्य विश्राम की गोद में ले जाता है। यह एक प्राकृतिक क्रम बना हुआ है। मनुष्य के जीवन में भी इसी प्रकार सुख और दुःख का क्रम बना हुआ है। कहा गया है कि सुख में मनुष्य गर्व से बचे और दुःख में निराशा से।
सुख और दुःख मनुष्य के जीवन पर बहुत प्रभाव डालते हैं पर मनुष्य का वास्तविक लक्ष्य इन दोनों ही स्थितियों में निराकुल बने रहने का होना चाहिए क्योंकि सुख में उत्पन्न आह्लाद और दुःख से उपजी हताशा मनुष्य के मन को संतुलित नहीं रहने देते।
जीवन में संतुलन बनाना एक प्रकार की स्थिरता है जिसके इर्द गिर्द दोनों प्रकार की शक्तियाँ, नकारात्मक और सकारात्मक, अपनी पूर्ण गतिशीलता से विद्यमान रहती हैं। यदि मनुष्य का तन-मन स्थिर है तो उसे संतुलित कहा जाएगा। इस प्रकार संतुलन बनाए रखने से मनुष्य अविचलित रहता है और सुख अथवा दुःख के क्षणों में अपनी धुरी से अलग नहीं होता।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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