भौंरा बन कर जीवन जीएं
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
भौंरा बन कर जीवन जीएं
आपने देखा होगा कि बगीचे में अनेक प्रकार के सुगन्धित फूल खिले हुए होते हैं और उन पर तितलियां और भौंरे मंडराते हुए भी दिखाई देते हैं। किसी फूल को किसी तितली या भौंरे को आमन्त्रण नहीं देना पड़ता कि मेरी सुगन्ध का आनन्द लेने के लिए मेरे पास आओ क्योंकि उसकी सुगन्ध स्वयमेव ही बगीचे में चारों ओर फैलने लगती है।
इसी प्रकार जिस समाज में एकता व संगठन के फूल खिलते हैं तो उनके परस्पर प्रेम, वात्सल्य व स्नेह की सुगन्ध अपने आप चारों दिशाओं में फैल जाती है। वहाँ तितली या भौंरे रूपी समाज के लोगों को एकत्रित होने के लिए कोई आमन्त्रण नहीं देना पड़ता। यही उनके निस्वार्थ प्रेम व एकता का प्रतीक है।
समाज की एकता से नगर में एकता होगी और नगरों की एकता ही राष्ट्रीय एकता को मज़बूत करेगी। समाज में एकता की भावना सागर के समान विशाल हृदय वाली होना चाहिए, जिससे हर व्यक्ति अपनी प्यास बुझा सके। जहाँ प्रेम व एकता की प्रगाढ़ता होती है, उस समाज और देश की नियम से उत्थान व उन्नति होती है।
समाज को संगठित रखने में सन्त की विशेष भूमिका व योगदान रहता है।
एक व्यक्ति के हाथ में पाँचों अंगुलियां अलग आकार की होती हैं, पर उनमें प्रवाहित होने वाला रक्त एक जैसा ही होता है। जब वे पाँचों अंगुलियां एक-साथ मिलकर मुट्ठी बन जाती है तो उनकी ताकत सौ गुणा बढ़ जाती है। यह है संगठन की शक्ति।
इसीलिए कहा जाता है - बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की।
जब कीचड़ में कमल पैदा हो सकता है, पत्थर की चट्टानों से झरने बह सकते हैं तो क्या मानव के कठोर हृदय में भक्ति, प्रेम व एकता के सुमन नहीं खिल सकते? एकता हमें जोड़ना सिखाती है और विरोध तोड़ना सिखाता है। एकता में सभ्यता और मित्रता दृष्टिगोचर होती है।
समाज में जितने मंडल हों, वे कमंडल के जल में समा जाएं और कमंडल का जल सागर का रूप धारण कर ले। उसमें प्रेम, वात्सल्य व स्नेह के फूल खिलें जिसकी सुगन्ध सारे वातावरण को सुगन्धित कर दे।
जैसे भौंरा केवल सुगन्ध देखता है, फूल नहीं; उसी प्रकार व्यक्ति केवल धर्माचरण देखें, व्यक्ति विशेष नहीं। अतः भौंरा बन कर जीवन जीएं ताकि समाज में एकता का संदेश दे सकें।
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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