अच्छे भाव बनाओ, अच्छा फल पाओ

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

अच्छे भाव बनाओ, अच्छा फल पाओ

महानुभावों! आज की बात मैं एक कथा से करना चाहता हूँ। 

कन्छेदीलाल का दोस्त लल्लूलाल वेश्या के यहाँ जाता था और कन्छेदीलाल मंदिर जाता था। दोनों के मन में भावों का अलग-अलग परिणाम जागृत हुआ। जो वेश्या के यहाँ जाता था, उसने सोचा कि देखो! मेरा मित्र कितना महान है। वह तो इस समय भगवान की पूजा कर रहा होगा और मैं कितना पापी हूँ जो इस समय पाप में लिप्त हो रहा हूँ। दूसरी ओर मंदिर में जाने वाला कन्छेदीलाल सोचता है कि मैं भी कहाँ भटक रहा हूँ। लल्लूलाल को देखो! कितने ऐशो आराम लूट रहा है।

देखा आपने! दोनों के भावों में कितना अंतर था। वेश्या के पास जाने वाला लल्लूलाल सोचता है कि मैं तो पापों में पड़ा हुआ हूँ और मेरा मित्र धर्म में लगा हुआ है। आप पूछेंगे कि महाराज! इन दोनों में अच्छा कौन है? मैं आपसे ही पूछता हूँ कि आपकी दृष्टि में कौन अच्छा माना जाएगा? मंदिर में आने वाला या वेश्यालय में जाने वाला? किसकी सद्गति होगी और किसकी दुर्गति?

हाँ, ठीक कहा आपने। मंदिर में आने वाले की दुर्गति होगी और वेश्यालय में जाने वाले की सद्गति। इसे ही कहते हैं - असमीचीनता। यदि वेश्या के पास जाने वाले को आपने अच्छा कह दिया तो सभी वेश्यालय, मंदिर बन जाएंगे क्योंकि आप कहेंगे कि महाराज ने कहा था कि वेश्या के पास जाने वाले की सद्गति होती है। इसलिए मंदिर में जाना ठीक नहीं है।

यह तो मामला और भी बिगड़ जाएगा। बिल्कुल उल्टा हो जाएगा। मंदिर में तो कोई आएगा ही नहीं। यदि मंदिर में मेरा परिणाम गड़बड़ हो गया तो! महाराज ने कहा था कि मंदिर में आना भी नरक का कारण हो सकता है। आप दर्शन पाठ तो बहुत ऊँची आवाज़ में बोलते हो पर दर्शन का सही अर्थ भी जानते हो - विवेक से मंदिर में दर्शन करना ही कल्याणकारी होता है। वेश्या के यहाँ जाना किसी भी अपेक्षा से अच्छा नहीं माना जा सकता। तुम्हारे परिणाम भले ही वेश्या के यहाँ शुद्ध हो जाएं तो भी ज़रा यह तो सोचो कि वह घर कौन सा है? वह तो पाप का घर है।                 

आप दूध भले ही पी रहे हो पर यदि शराब की दुकान पर बैठ कर दूध के प्याले को अपने होठों से लगाए हुए हो तो भी, चाहे तुम कितना ही कहते रहो कि मैं तो दूध पी रहा था, लोग तो यही देखेंगे कि कहाँ पी रहा था? देखो! मैं तुम्हारी बात मानूँ या अपनी आँखों देखी!

यदि आप दूध पी रहे थे तो शराब की दुकान पर क्यों?

‘यद्यपि शुद्धं, लोक विरुद्धं, न करणीयम्, न आचरणीयम्।’

तुम दूध तो पी रहे थे लेकिन शराब की दुकान पर पी रहे थे। इस कारण यह मार्ग तो बदनाम हो ही जाएगा, तुम बदनाम हो या न हो। वेश्या के घर जाने वाला यदि सद्गति में चला गया तो क्या सद्गति में जाने वाले सब लोग वेश्यालय जाने लगेंगे। वे यह नहीं सोच पाएंगे कि वेश्यालय में जाने वाले के मन में भावों का क्या परिणाम चल रहा था।

यह भारत है बहुत विचित्र! यहाँ लोक रूढ़ियाँ बहुत प्रचलित हैं। लोग आँखों वाले होकर भी दिमाग से अँधे होते हैं क्योंकि वे सोचने समझने की क्षमता नहीं रखते। विवेकहीन है न भारत! तभी तो इतने अमीर होते हुए भी यहाँ के लोग ग़रीब हैं।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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