आत्मा का स्वभाव

मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज

आत्मा का स्वभाव

जैसे पानी का स्वभाव शीतलता है वैसे ही हमारी आत्मा का स्वभाव है - दया, करुणा, वात्सल्य।

लेकिन हम स्वभाव में कम, विभाव में ज्यादा रहते हैं। चाहते हैं सुख और दौड़ रहे हैं दुख की ओर।

एक अम्मा थी, अपने बेटे के साथ रहती थी। उम्र ढलने लगी, बुढ़ापा आ गया। न चलते बनता था, न सुनते। न ठीक से दिखाई देता था और न ठीक से खा पाती थी, पर खाली भी नहीं बैठा जाता था। एक दिन सोचा कि चलो, सूई में धागा डाल कर रख लेती हूँ। कभी तो काम आ ही जाएगा। उठाई सूई और लगी धागा डालने पर हाथ कांपने लगे; धागा तो डाल न सकी, सूई भी हाथ से छूट गई।

अब क्या करे? बचपन की एक बात याद आ गई कि कुछ खो जाए तो वह वस्तु उजाले में ही मिलेगी, अंधेरे में तो मिलने से रही। आ गई घर से बाहर क्योंकि वहाँ उजाला था, घर में अंधेरा था। लगी खोजने। एक आदमी ने देखा तो पूछने लगा कि ‘अम्मा! क्या खोज रही हो?’ 

‘बेटा! मेरी सूई खो गई है। मैं अपनी सूई खोज रही हूँ।’

वह भी मदद करने लगा पर सूई वहाँ हो तो मिले न! सूई मिली नहीं। तभी उसका बेटा आ गया। बोला कि ‘अम्मा, आप सड़क पर क्या खोज रही हो?’ 

उसने वही उत्तर दिया कि ‘बेटा! मैं अपनी सूई खोज रही हूँ।’


बेटे को कुछ संदेह हुआ और उसने कहा कि ‘तुम सूई लेकर बाहर क्यों खड़ी थी?’


‘अरे! नहीं बेटा! सूई लेकर तो मैं घर के अंदर ही खड़ी थी और उसमें धागा डाल रही थी। लेकिन अचानक हाथ कांपने लगे; सूई भी हाथ से छूट गई और धागा भी नहीं डाल पाई।’


‘कहाँ गिरी थी सूई?’

‘घर के अंदर।’

‘तुम कहाँ खोज रही हो?’

‘घर के बाहर।’

‘क्यों?’

‘क्योंकि बाहर उजाला था न बेटा।’

‘अरे अम्मा! सूई जहाँ गिरी है, वहीं तो मिलेगी।’


बस! यही है हमारा हाल। सुख की सूई गिरी तो है मन के अंदर और हम खोज रहे हैं बाहर की पर-वस्तुओं में। तुम तो उस मकड़ी के समान हो जो स्वयं दुःखों का जाला बुनती है और उसमें ही फंस कर अपनी जान गवां बैठती है।

गुरु के पास बैठोगे तभी तो अंधेरे और उजाले में अन्तर पता चलेगा।

गुरु स्वयं को बदलने की क्रिया जानते हैं। वे तुम्हें भी हर हाल में सुखी रहना सिखा देंगे। दूसरे को बदलने चलोगे तो वे तुम्हें ही बदल कर रख देंगे। 

शरीर के संबंध तभी तक साथ देते हैं जब तक उनका स्वार्थ पूरा होता है। सांसारिक कार्यों में दुःखी होने की आवश्यकता नहीं है। 

सुख पाना चाहते हो तो बस एक सूत्र याद रखो - देखो, जानो और जाने दो। 

धार्मिंक कार्यों में याद रखो - देखो, समझो और अपना लो। 

भेद विज्ञान को समझो - शुद्धोऽहं, बुद्धोऽहं, निरंजनोऽहम्।


ओऽम् शांति सर्व शांति!!

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