घमंडी का सिर नीचा
मुनि श्री विरंजन सागर जी महाराज
घमंडी का सिर नीचा
घमण्डी व्यक्ति कमान से छोड़े हुए तीर के समान है जो थोड़ी देर हवा में उड़कर धरती पर गिर जाता है। आपकी नम्रता आपका कवच है। इस कवच में तनाव के तीर चुभ नहीं सकते। कोई इस कवच को चाहे कितने कटु वचनरूपी तीर मारे, आप इस कवच को कभी न उतारें। नम्रता आपके जीवन को निश्चित रूप से दिव्यता की ओर ले चलेगी। अभिमानी बनकर ‘ऊँचाई’ हासिल करना कदाचित् संभव हो सकता है किन्तु नम्रता के बिना ‘अच्छाई’ प्राप्त करना नितान्त असंभव है।
‘‘कबिरा गर्व न कीजिए, कबहुँ न हँसिए कोय।
अबहुँ नाव समुद्र में, का जाने का होय।’’
आप यह भूल जाएँ कि जो कुछ आपके पास है वह पुण्य की देन है। पुण्य का अहंकार करना, उस प्राप्त योग्यता को नष्ट करने का कारण बन सकता है।
बात उस समय की है जब अवन्तिका नगरी का गौरव सेठ उदयमल थे जो राज्य के पुराने जाने-माने सेठों में गिने जाते थे। उन्होंने ऐसे सदावर्त खोल रखे थे, जहाँ नित्य-प्रति अनेक भिक्षुओं की भीड़ लगी रहती थी। कभी भी किसी टोली की झोली वहाँ से खाली नहीं लौटी थी। जब सेठ उदयमल भिक्षुकों की झोली में अन्न, वस्त्र आदि डालते थे तब साथ ही अपने हृदय की झोली में घमण्ड या अभिमान भी डालते जाते थे।
सेठ उदयमल का मानी हृदय ‘दानवीर’ या ‘‘अपूर्वदानी’’ कहलाने के लिए मचल उठता था। यही कारण था कि वे पर्वों के उन पवित्र दिनों में क्षिप्रा नदी पर स्नानथियां के अल्पाहार का प्रबंध किया करते थे। एक बार सेठ की दुकान से राजकुमारी के विवाह के निमित्त सोना-चाँदी, जेवर-रत्न आदि खरीदे गए थे। फलस्वरूप सेठ उदयमल को लाखों का लाभ हुआ।
एक दिन सेठ अपनी माँ से इस नई कमाई का घमण्ड जताते हुए बोला - ‘‘माँ! अब तेरा बेटा लखपतियों की श्रेणी में सबसे ऊपर है।’’ माँ बेचारी साधारण परिवार की एक भोली-भाली स्त्री थी। उसने अपनी जिंदगी में बीस तीस हजार से अधिक रुपए कभी देखे नहीं थे। अतः एक दिन वह बोली - ‘‘बेटा! क्या एक लाख रुपए एक हण्डिया में समा जाते हैं?’’ सेठ उदयमल ने अभिमान भरे स्वर में कहा - ‘‘नहीं माँ! इससे बहुत ज्यादा होते है।’’ यह सुनकर माँ बोली - ‘‘तो फिर घड़े भर होते होंगे?’’ वह हँसा और बोला - ‘‘माँ! क्या तुमने कभी लाख रुपया देखा ही नहीं? मै कल भीतरी चौक में एक लाख रुपये का ढेर लगवा दूँगा। तब तुम अच्छी तरह से जी भर कर देख लेना कि एक लाख रुपये कितने होते हैं।’’
दूसरे दिन सेठ उदयमल ने अपनी हवेली के भीतरी चौक में एक लाख रुपये का ढेर लगवा दिया। सेठ की माँ की आँखें इन चमकते चाँदी के सिक्कों को देखकर चमचमा उठी और वह अनायास ही ढेरी के ऊपर जा बैठी और कुतूहलवश सिक्कों को उछालने लगी।
यह नजारा देखकर सेठ के हृदय में एकाएक घमण्ड जाग उठा। वह बोला - ‘‘माँ! तुम्हारे चरण स्पर्श से ये पवित्र हो गए हैं, मेरी इच्छा है कि मैं इन्हें दान में दे दूँ।’’
माँ ने खुश हो कर कहा - ‘‘हाँ बेटा! यह बहुत अच्छी बात है। रोज़-रोज़ देने पर भी बहुत लम्बे समय तक यह दान-पुण्य चलता रहेगा।’’ सेठ उदयमल ने तपाक से कहा - ‘‘नहीं माँ। इन सिक्कों के ढेर को, मैं एक ही पात्र को, समूचा एकबारगी में दान देना चाहता हूँ। ऐसा विशाल और अनोखा दान इस नगरी में क्या, कहीं दुनिया भर में न किसी ने सुना होगा न कहीं देखा होगा। लोग दाँतों तले अँगुली दबाएँगे और इससे अपने घर की कीर्ति-पताका भी खूब फहरायेगी।’’
इतना कहकर सेठ तो चुप हो गया किन्तु उसका घमण्डी मन वाचाल हो उठा। मन ने कहा - राजा और प्रजा तुझे ‘अद्भुत दानी’, ‘विशाल दाता’ और ‘परम धर्मात्मा’ कहकर सम्बोधित करेगी। मन की ऐसी बात सुनकर सेठ का मुख-मण्डल चमक उठा।
माँ ने कुछ सोच कर कहा - ‘‘बेटा! जब एक पात्र को ही देना है तो अपने यहाँ पूजा-पाठ करने वाले पण्डित शुक्ला जी को दे देना।’’ सेठ का मानी हृदय बोला - ‘‘नहीं माँ! मैं राजपुरोहित को बुलाऊँगा और यह विशाल द्रव्य मैं उन्हें ही दान दूँगा। ऐसा करने से राजपुरोहित मेरे दान की चर्चा राजा से, दरबारियों से तथा समस्त गणमान्यों से करेगा। तब लोग मुझे विभिन्न उपाधियाँ देने आएँगे और जग भर में मेरी प्रतिष्ठा की धूम मचेगी। इससे हमारे वंश की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ जाएगी।’’
सेठ उदयमल ने राजपुरोहित को आदर सहित बुलवाया और गर्वयुक्त वचनों से बोला - ‘‘आदरणीय राजपुरोहित जी! मैं आपका सम्मान करता हूँ और यह लाख रुपयों का ढेर आपको दान में देना चाहता हूँ। ऐसा दान आज तक आपने न किसी हवेली में देखा होगा और न कहीं राजघरानों में सुना होगा।’’ यह कहते-कहते सेठ का दंभ उसके मुख-मण्डल और आँखों में चमक आ गई।
राजपुरोहित ज्ञानी था। उससे सेठ का यह झूठा दंभ सहन नहीं हुआ। उसने फौरन अपनी जेब से एक चाँदी का सिक्का निकाला और रुपयों के ढेर पर डालकर कहा - ‘‘सेठ जी! आपके रुपयों के ढेर पर अपना भी एक रुपया देकर इन सबको मैं त्यागता हूँ।’’ राजपुरोहित ने आवेश युक्त स्वर में आगे कहा - ‘‘सेठ जी! ऐसा विशाल त्याग आपने देखा तो क्या सुना भी न होगा?’’ इतना कहकर राजपुरोहित झट हवेली से चलता बना। सेठ उदयमल का चेहरा उदास हो गया था और सिर नीचे धरती की गहराई नाप रहा था। इस नज़ारे को देखने वाले नगरवासियों के मुख से शब्द निकले -
‘‘घमण्डी का सिर नीचा।।’’
ओऽम् शांति सर्व शांति!!
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